यादां विछड़े सजन दियां आइयां
अखियाँ चो मी वसदा।
![]() |
[परम पूजनीय पिता चौधरी रामलाल भाटिया] |
![]() |
[परम पूजनीय पिता चौधरी रामलाल भाटिया] |
दिल्ली [अश्विनी भाटिया ] दुनिया में जिस गति से मुस्लिम आबादी बढ़ रही है उसको लेकर कई अन्य धर्म को माननेवाले लोगों में यह चिंता का विषय है बनता जा रहा है, परन्तु धर्मनिरपेक्षता की बीमारी से ग्रस्त हिन्दू इससे सचेत नहीं हुआ। इतिहास साक्षी है कि मुस्लिम आक्रान्ताओं के जुल्मों और अत्याचारों का सबसे अधिक शिकार भारत और हिन्दू समाज ही हुआ है। इस चिंता का कारण भी जायज है ,क्योंकि जिस किसी भी क्षेत्र या देश में मुस्लिम बहुलता हुई वहां पर न तो लोकतंत्र ही जिन्दा रहा और न ही धर्मनिरपेक्षता नाम की कोई वस्तु शेष रही। इसका ताज़ा उदाहरण इराक ,ईरान, अफगानिस्तान और 1947 में भारत से काटकर अलग किये गए क्षेत्र जिसको पाकिस्तान का नाम दिया गया और 1971 में उससे अलग करके बने बांग्लादेश नामक इस्लामिक देश हैं। और तो और भारत के कश्मीर की हालत भी हमारे सामने है वहां मुस्लिम आबादी अधिक होने के कारण किस तरह से हिन्दू -सिखों को मारा गया और उनको अपने घरों से बेघर कर दिया गया। इन मुस्लिम देशों में कैसा लोकतंत्र है ?कैसी धर्मनिरपेक्षता है और कैसी सामाजिक शांति है? सभी भली -भांति जानते हैं। इन देशों में गैर मुस्लिमों की दुर्दशा का जीता -जगता प्रमाण आज इराक ,सीरिया ,पाकिस्तान और बांग्लादेश में देखा जा सकता है ?अफ़सोस है कि लगभग 700 वर्षों तक मुस्लिम आक्रांताओं की गुलामी में रहकर हिन्दुओं ने जिन अत्याचारों और आतंक को झेला उससे हिन्दू समाज ने कोई सबक नहीं सीखा है और लगभग 200 वर्षों तक अंग्रेजी शासकों की गुलामी के बाद भी हम सचेत नहीं हैं क्यों ?अगर आज कोई हिन्दू नेता हिन्दुओं को अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह देता है तो सबसे पहले मीडिया हो -हल्ला मचाता है और उसके बाद धर्मनिरपेक्षता के कथित झंडाबरदार हंगामा करके अपने को देश के सबसे बड़े हितैषी होने का दावा करते हैं ,क्यों ? क्यों इनमें से कोई भी यह बात नहीं करता कि एक जेहादी एजेंडे के तहत दिन -रात बढ़ाई जा रही मुस्लिम बच्चों की पैदावार पर सरकार रोक लगाए ? आज़ाद भारत में समानता का ढोल पीटने वाले शासक और राजनैतिक -समाजिक -धार्मिक नेता यह बताएं कि सारी पाबंदियां हिन्दुओं पर ही क्यों ? आज ऐसे हिन्दुओं की भी कमी नहीं है जो सिर्फ पैसा कमाने और ऐशो -आराम के संसाधनों को एकत्र करने में ही जुटे हुए हैं। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि आनेवाले दशकों में अगर मुस्लिम इसी गति से बच्चों की पैदावार करते रहे और हिन्दू सिर्फ एक -दो पर ही अटके रहे तो उनकी आनेवाली नस्लों का क्या होगा ?क्या भारत में भी सीरिया -इराक जैसे हालत पैदा होने से कोई रोक पायेगा ? क्या मुस्लिम बहुल होते ही भारत में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता बच पायेगी ? इस बात का चिंतन आज हिन्दुओं को करना होगा और भारत की सरकार पर यह दवाब बनाना होगा कि वह राष्ट्र और मानवता के हित में सभी धर्मावलम्बियों से परिवार नियोजन का नियम सख्ती से लागू करवाए और इसको न माननेवालों से सभी सरकारी सुविधाएँ छीन ले। अगर सरकार ऐसा कानून नहीं लागू करती है तो हिन्दू भी एक -दो बच्चों को पैदा करने की मानसिकता को छोड़कर अपनी आनेवाली नस्लों ,अपने धर्म और अपने देश के भविष्य को खतरे में पड़ने से बचाने के लिए अधिक बच्चे पैदा करें।इसी में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की भलाई है और इसी में भारत में शांति कायम रह सकती है और उसका भविष्य भी उज्जवल है।केंद्र
भगवान श्री राम के जन्मोत्सव [रामनवमीं 28 मार्च ,2015 ] पर उनके चरणों में हमारा शत -शत नमन । भारतीय संस्कृति और अस्मिता की पहचान और सबसे बड़े अवतार मर्यादाप्रशोत्तम श्री राम के द्वारा स्थापित सिद्धांतों पर चलकर ही हिन्दू जनमानस अपनी सभी समस्याओं और चुनौतिओं का मुकाबला कर सकता हैं। हिन्दुओं की दुविधा ही यही है कि वह अपने भगवान की पूजा करने और उनसे चमत्कार करने पर ही विश्वास करते हैं , लेकिन वह [हिन्दू ] अपने भगवानों [राम-कृष्ण ] के बताये रास्ते पर चलने से परहेज करते हैं, हिन्दुओं की दुर्दशा होने का कारण ही यही है। अगर हिन्दू चमत्कार और आडंबरों को त्यागकर अपने भगवान श्री राम और श्री कृष्ण के द्वारा स्थापित सिद्धांतों को ही अपना लें तो उसकी हर समस्या का निदान हो सकता है। अफ़सोस इस बात का है कि आज हिन्दू समाज जिसमें विशेषतौर से महिलाएं अपने अवतारों से ज्यादा विश्वास मजारों - मुल्ला -मौलवियों ,पाखंडी बाबाओं और ज्योतषियों -तांत्रिकों में करके आर्थिक और शारीरिक शोषण का शिकार हो रहे हैं। हमारे अवतारों ने अन्याय और आततायी शक्तियों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध करके मानव जाति का उद्धार किया। लेकिन हिन्दुओं ने अपने सामने आनेवाली चुनौतियों का मुकाबला करने की बजाय अपने भगवानों से ही चमत्कार करने की गुहार की और गुलामी की बेड़ियों में बंध गए । हम हिन्दुओं ने लगभग एक हज़ार साल तक गुलाम रहने के बावजूद भी कोई सबक नहीं सीखा और आज भी पूर्व में की गई अपनी पीढ़ियों की गलती को दोहरा रहे हैं। आज भी अगर हम सचेत नहीं हुए और भगवानों की सिर्फ पूजा करने और कथा -कहानियाँ सुनने में ही लगे रहे तो हम भविष्य की गंभीर चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएंगे। मगर हिन्दू समुदाय आज भी अपने अवतारों से मिले अन्याय और आततायी ताकतों विरुद्ध संघर्ष करने के सन्देश को भूलकर सिर्फ चमत्कारों और पूजा -पाठ में ही अपनी समस्यायों का निदान ढूंढ रहा है। ऐसा करके वह अपने भगवानों के साथ तो विश्वासघात करही रहे हैंसाथ ही अपनी आनेवाली पीढ़ियों के लिए भी गंभीर चुनौतियों और संकटों को पैदा कर रहे हैं।
दिल्ली [अश्विनी भाटिया ] , भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करवाने के लिए असंख्य सपूतों ने अपने प्राणो की आज़ादी की लड़ाई मेंआहुति दे दी।भारत माँ के इन सपूतों में भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। आज इनके बलिदान दिवस पर हम इनके चरणों में अपना शत -२ नमन करते हैं।भारत माँ के इन सपूतों की कुर्बानी के कारण ही हम आज आज़ादी से साँस ले रहे हैं। इनका ऋण हम कभी नही उतार सकते। अफ़सोस है की बात यह है कि आज़ाद भारत की सरकारों ने आज़ादी का सारा श्रेय सिर्फ गांधी - नेहरू तक सीमित करके असंख्य भारत माँ के सपूतों के साथ अन्याय किया। आज के दिन 23 मार्च , 1931 को भारत में अंग्रेजी सरकार ने आज़ादी के दीवाने भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया था।यह दिन भारत में शहीदी -दिवस के रूप में याद किया जाता है। शहीद दिवस के मौके पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को श्रद्धांजलि देने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हुसैनीवाला गॉव जा रहे हैं, जहां इन शहीदों की समाधियों पर अपनी श्रद्धांजलि देंगे। इसके बाद पीएम मोदी स्वर्ण मंदिर और जलियांवाला बाग भी जाने वाले हैं। जानकारी के अनुसार, पीएम मोदी दोपहर एक बजे पंजाब के फिरोजपुर में हुसैनीवाला पहुंचेंगे। हुसैनीवाला में तीनों शहीदों की समाधि है। 23 मार्च 1931 को ही अंग्रेजों ने शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी थी। शहीदों को श्रद्धांजलि देने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोपहर दो बजे अमृतसर में स्वर्ण मंदिर मत्था टेकने जाएंगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी पहली बार स्वर्ण मंदिर पहुंचेंगे। वह शहीदों को श्रद्धांजलि देने जालियांवाला बाग भी जाएंगे। 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर ने यहीं पर निहत्थे क्रांतिकारियों पर गोलियां चलवाई थीं।
लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए मतदान करना बहुत ही आवश्यक है।दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम के मुसलमानों को आप पार्टी को वोट देने का फ़तवा देकर धर्मनिरपेक्षता को एक बार फिर चुनौती दी है।दिल्ली की जनता इस फतवे का मुंह तोड़ जवाब अपने मत का 100 प्रतिशत मतदान उस पार्टी जिसके विरुद्ध फ़तवा आया है, के पक्ष में करके शाही इमाम जैसे कटटरवादी धर्म के ठेकेदार को उसकी असली औकात दिखा दें।
दिल्ली [अश्विनी भाटिया ] भारत के 66 वें गणतंत्र दिवस पर सभी देशवासिओं को बहुत - बहुत हार्दिक शुभकामनाएं। इस अवसर पर हम सब देशवासिओं को भारत को विश्व पटल पर सबसे शक्तिशाली ,समृद्धशाली और वैभवशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लिए दृढ़ संकल्प लेना चाहिए और आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ने की शपथ भी लेनी चाहिए।यही शपथ ही हमारे देश की अस्मिता और स्वाभिमान पर अपना सब कुछ न्योछावर करनेवाले असंख्य शहीदों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिनकी[शहीदों ] वजह से हम भारत को एक गणतंत्र के रूप में देख पा रहे हैं। एक शक्तिशाली भारत ही अपनी आंतरिक और बाहरी चुनौतिओं का सामना करने में सक्षम हो सकता है।
[दिल्ली ] अश्वनी भाटिया। बसंत पंचमी यानि विद्या और बुद्धि की देवी माँ सरस्वती पूजा की सभी मित्रों व शुभचिंतकों को हार्दिक शुभकामनाएं। सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। उसमें विचारणा, भावना एवं संवेदना का त्रिविध समन्वय है। वीणा संगीत की, पुस्तक विचारणा की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है। लोक चर्चा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है।
दिल्ली [अश्विनी भाटिया ] भारत की आज़ादी की लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 118 वीं [जन्म 23 जनवरी ,1897 ] जयंती पर हम उनके चरणों में अपना शत -2 नमन करते हैं। नेताजी का भारत को अंग्रेजी साम्राज्य की अधीनता से मुक्त करवाने की लड़ाई में उल्लेखनीय योगदान है जिसका कोई दूसरा उदाहरण विश्व इतिहास में नहीं मिलता। नेताजी ने अंग्रेजों से देश को मुक्त करवाने के लिए किसी याचना या किसी तरह की प्रार्थना करने का मार्ग नहीं अपनाया, बल्कि उस समय के सबसे शक्तिशाली समझे जाने वाले अंगेजी साम्राज्य को सशत्र चुनौती देकर उनकी मजबूत चुलों को हिलाकर रख दिया। नेताजी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डर' के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के सुप्रीम कमांडर नेताजी ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध जंग के मैदान में खुलकर लोहा लिया। 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान,फिलीपाइन, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।उन्होंने देश के लोगों को 'तुम मुझे खून दो में तुम्हे आज़ादी दूंगा ' का उदघोष देकर पूरे देश को अंग्रेज़ों के विरुद्ध नए जोश और जनून के साथ लड़ने को प्रेरित किया जिसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों को 1947 में भारत से भागने को विवश होना पड़ा। अफ़सोस की बात यह है कि कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं से बोस के विचार नहीं मिले और एक दिन वह गायब हो गए। आज़ाद भारत में एक राजनैतिक एजेंडे के तहत नेताजी की मौत के बारे में तरह -2 की मान्यताएं गढी गईं और सच को जनता के सामने नहीं आने दिया गया। न जाने किस साजिश या अज्ञात भय से ग्रस्त राजनैतिक ताकतें आज तक भी इस रहस्य पर पड़े पर्दे को हटाने से घबराती हैं ? गत 16 जनवरी, 2014 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने नेताजी के लापता होने के रहस्य से जुड़े खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की माँग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के लिये स्पेशल बेंच के गठन का आदेश दिया। यह भारत का दुर्भाग्य है कि नेताजी के आज़ादी की लड़ाई के योगदान का श्रेय बाद में नेहरू -गांधी के सिर बांधकर कांग्रेस ने देश की आनेवाली नस्लों को गुमराह करने का कुकृत्य किया। नेताजी के सपनों और नीतिओं को आज़ाद भारत की सरकारों ने तिलांजलि दे दी। अगर नेताजी के सामने भारत को अंग्रेजों से आज़ादी मिलती और देश की कमान उनके हाथों में होती तो देश और दुनिया का नक्शा आज जैसा नहीं होता और पाकिस्तान जैसी बीमारी भी पैदा नहीं हो पाती।ऐसा लगता है कि आज़ाद भारत की सरकारों ने जानबूझ कर नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस से नाइंसाफी करके उनके योगदान को कम करने की साज़िश की है। यह देश की जनता का उनके प्रति अगाध प्रेम ही है कि सरकारी स्तर पर नज़रअंदाज़ कर देने के बावजूद भारत के करोड़ों लोग आज भी नेताजी को अपने दिलों में बसाए हुए हैं और उनकी यह उपस्थिति सदा -सदा भारतीयों के दिलों में यूँही उनकी याद को सजीव बनाये रखेगी।


अलवर [अश्विनी भाटिया ] राजस्थान में प्रशासन के अधिकारियों पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान का कोई असर दिखाई नही दे रहा है। मज़ेदार बात यह है कि राजस्थान का अलवर जिला एनसीआर में शामिल है और दिल्ली के बहुत ही नज़दीक है, जब इस जिले में स्वच्छ भारत अभियान टांय - 2 फिस हो रहा है तो दूर -दराज़ के जिलों का क्या हाल होगा ,सहज ही अंदाज़ लगाया जा सकता है ?मजेदार बात यह है कि जिला प्रशासन अपने तहसील और उपखण्ड कार्यालयों की सफाई करवाने में नाकाम सिद्ध हो रहा है। इस सवांददाता को जिले की रामगढ तहसील और उपखण्ड अधिकारी के कार्यालय में गंदगी का जो वातावरण मिला उससे यह सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यहां के प्रशासनिक अधिकारी जब अपने कार्यालयों को ही साफ नहीं करवा सकते तो वह अपने अधीन आनेवाले क्षेत्रों को कैसे स्वच्छ रख सकते हैं ? इस सवांददाता ने जब उपखण्ड अधिकारी रामगढ़ [एस डी एम ]श्री अखिलेश कुमार पीपल से इस संबंध में बात की तो उनका जवाब सुनकर बहुत ही आश्चर्य हुआ और यह समझ में आ गया कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के अधिकारी किस कारण से और क्यों अपनी निकम्मी और गैरजिम्मेदार कार्यशैली को अपना अधिकार बनाए हुए हैं क्योंकि उन्हें राज्य सरकार से किसी भी तरह का कोई भय नहीं है। कार्यालय में फैली गंदगी के बारे में उपखण्ड अधिकारी श्री पीपल का जवाब था कि''यह काम मेरा नहीं है ,मैं यहाँ सफाई करने के लिए नहीं आता ।'जब सवांददाता ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी स्वयं झाड़ू लेकर भारत को स्वच्छ बनाने का अभियान चलाये हुए तो उन जैसे जिम्मेदार अधिकारी इस अभियान को गंभीरता से क्यों नहीं ले रहे तो उन्होंने कहा कि 'तो यह बात मोदी से जाकर पूछ लो कि यहाँ की सफाई क्यों नहीं हो रही। ''
स्वामी विवेकानंद जी स्वामी विवेकानन्द (जन्म: १२ जनवरी,१८६३ - मृत्यु: ४ जुलाई,१९०२) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों" के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।आज स्वामीजी के जन्मदिवस [12 जनवरी ,1863 ] पर हमारा उनके चरणों में अपना शत -२ नमन करते हैं। 
अलवर [अश्विनी भाटिया ]। अलवर राजस्थान में बीजेपी की वसुंधरा सरकार के राज्य की जनता को सुलभ,त्वरित और स्वच्छ शासन देने के सभी दावों को ताक पर रखकर प्रशासन में बैठे अधिकारी अपनी मनमानी कर रहे हैं । ऐसा लगता है कि कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के बिगड़ैल अधिकारीयों को , जिनके कारण उस सरकार का पतन हो गया था, सरकार बदलने के बावजूद अभी तक अपनी पूर्व की भ्रष्ट और मनमानी करनेवाली कार्यशैली को बदलने की कोई जरुरत महसूस नहीं हुई है।राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों की अकर्मण्यता ही वसुंधरा सरकार का ग्राफ जनता की नज़रों में गिराने में कारगर साबित हो रही है।अलवर जिले की अधिकांश तहसीलों और उपखण्डों में बड़े पैमाने पर रेवेन्यू मामले जिनमें राजस्थान भूमि काश्तकारी अधिनियम के वर्षों से लंबित पड़े मामलों का निस्तारण करने के उद्देश्य से fasht track court का गठन किया गया था जिनमें अधिकांश न्यायालयों में न तो पीठासीन अधिकारी हैं और ना ही दूसरा स्टाफ ही लगाया गया है। इस तरह से यह फाष्ट ट्रैक कोर्ट एक तरह से डैड ट्रैक कोर्ट में तब्दील हो चुकी हैं।इसी तरह से रामगढ उपखण्ड में फाष्ट ट्रैक कोर्ट का गठन गत फ़रवरी, 2013 में किया गया था जो मात्र 3 माह काम करने के बाद अपना दम तोड़ गयी, अर्थात मई 2013 से यह कोर्ट मृत प्राय पड़ी है। ना तो इस कोर्ट में कोई पीठासीन अधिकारी है ना ही कोई अन्य स्टाफ ही मौजूद है।![]() |
![]() |
सेकुलरता के झंडाबरदार क्या इस बात का जवाब देंगे ? या सिर्फ हिन्दुओं को ही आसान शिकार बनाने की मानसिकता वालों को वोटों की राजनीती के तहत एकतरफा राग अलापने की ही बीमारी हो चुकी है ?कथित सेकुलर कीड़ों को अभिवक्ति की असली आज़ादी तो सिर्फ हिन्दुओं पर ही छींटाकशी करने की मिली हुयी है। आमिर खान हो या राजकुमार हिरानी और चाहे न्यूज़ चैनल पर अपना धंधा करनेवाले एंकर, सबके सब सिर्फ हिन्दुओं को ही सुधारने का ऐड़ी -चोटी का जोर क्यों लगाये हुए हैं? ऐसा लगता है कि सारा अन्धविश्वास और पाखंड हिन्दू धर्म में ही समाया हुआ है और मध्यकालीन बर्बरता का घिनौनी हिंसक प्रवृति अपनाये हुए किताबी मजहब वाले बड़े पाक -साफ ईमानदार लोग हैं।हिन्दुओं की सहनशीलता और रहमदिली को आज उनकी कमजोरी माना जाने लगा है और दूसरे मजहब की निर्दयता व् हिंसक प्रवृति ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा की गारंटी बन चुकी है। इस बात पर हिन्दू समाज के झंडाबरदारों को भी सोचना पड़ेगा कि उनकी कमी कहां पर है और इसको कैसे सुधारा जाना चाहिए ?सिर्फ हिन्दुओं को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ानेवाले सेकुलरवादी मुसलमानों को भी यह राग सुनाकर समझाएं तो पूरी मानवता का इससे बढ़कर और कोई भला नहीं हो सकता। क्या हिन्दू ही अंधविश्वासी हैं या हिन्दुओं पर कीचड़ उड़ेलना आसान है ?सेकुलरवादी इसका जवाब देंगे ?क्या हिन्दू धर्म की नरम सोच और सहनशीलता की प्रवृति ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी मानी जा रही है ?